Wednesday, 27 September 2017

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Tuesday, 26 September 2017

mamta ka sparsh: चलो इक बार फिर से.....

mamta ka sparsh: चलो इक बार फिर से.....: चलो इक बार फिर से..... न जीने पर हक है न ही मरने पर इख्तियार.... हकीकत में इन्हीं मजबूरियों का नाम है इंसान। लेकिन कुछ तो ऐसा भी है ...

चलो इक बार फिर से.....

चलो इक बार फिर से.....

न जीने पर हक है न ही मरने पर इख्तियार.... हकीकत में इन्हीं मजबूरियों का नाम है इंसान। लेकिन कुछ तो ऐसा भी है जिन्दगी में जिसे बनाने और बिगाडऩे पर इंसान का पूरा हक होता है और वो है रिश्ते। हर रिश्ता जिन्दगी में अहम होता है लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि ये रिश्ते ही हमारी जी का जंजाल बन जाते हैं और जब वे टूटते हैं तो जिन्दगी भर की टीस दे जाते हैं। हां अगर इन्हें समझदारी से खत्म करें तो ये दर्द कुछ कम जरूर हो सकता है।
विवेक और सुधा की शादी को तीन साल हो गए लेकिन तीन साल में भी वो सेटल नहीं हो पाए क्योंकि सुधा एक सामान्य परिवार से थी और अपने पति की हाई प्रोफाइल जिन्दगी में एडजस्ट नहीं कर पाई। रोज रोज के झगड़े और आए दिन की कहासुनी दिन-ब-दिन बढऩे लगी। हालत इतने बिगड़ गए कि दोनों का साथ रहना मुश्किल हो गया। लेकिन अपने माता पिता की इज्जत और समाज के डर की वजह से दोनों इस रिश्ते को ढोए जाए रहे थे। एक ही छत के नीचे दोनों अजनबी बनकर रह गए थे। लेकिन यह कहां तक सही है ? लाख कोशिशों के बावजूद सुधा यह सोचकर इस रिश्ते को निभाती रही कि कभी ना कभी तो विवेक उसके प्यार को समझेंगे और उनकी जिन्दगी भी सामान्य हो जाएगी।
रिश्ता चाहे पति पत्नी का हो या दोस्ती का या फिर ब्रॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड का। इन सबमें जरूरत होती है प्यार और आपसी समझ की। जब इसी प्यार और आपसी समझ में कमी आने लगती है तो झगड़ों की शुरूआत होती है। यह बात हम सभी जानते हैं कि झगड़े से किसी भी समस्या का हल नहीं निकलता। इसलिए आपसी मनमुटाव को समझदारी से सुलझाने की कोशिश करें। माना रिश्तों में खटास आने के बाद प्यार की गुंजाइश नहीं रह जाती लेकिन एक बार कोशिश तो की ही जा सकती है। कुछ रिश्ते जो बिना गहराई तक एक दूसरे को जाने समझने तुरंत आकर्षण में जब बन जाते हैं तो उनकी उम्र लम्बी नहीं होती। अपेक्षाएं पूरी न हो पाने की स्थिति में प्यार कम होने लगता है और नफरत पनपने लगती है। ऐसे में जब रिश्ता टूटता है तो बदले की भावना भी घर कर जाए कोई बड़ी बात नहीं। और जब रास्ते जुदा हों तो किसी के प्रति नफरत को भी मन से निकाल दें और उस संबंध को बिना किसी दुर्भावना के तिलांजलि दे दें। प्यार को नफरत में तब्दील होने का एहसास वाकई तकलीफ देह होता है लेकिन किसी अच्छे रिश्ते को खत्म करना एक बुरे रिश्ते की शुरूआत कदापि नहीं। जब रिश्ता ही खत्म कर दिया तो सब कुछ खत्म समझें। नफरत और बदले की भावना दिल में लेकर अगर आगे बढ़ते रहे तो जिन्दगी और उलझ जाएगी। अगर आप किसी से रिश्ता तोड़ रहे हैं तो जाहिर है उसकी कोई ठोस वजह जरूर रही होगी लेकिन यह वजह आप सामने वाले को ईमानदारी से बताएं। इसे राज बनाकर सीने में दफन न कर लें। जो कुछ भी दिल में है उसे साफ साफ कह दें। इससे कम से कम आपके दिल का बोझ तो हल्का हो ही जाएगा, साथ ही पछतावा भी नहीं रहेगा कि हम बोल नहीं पाए। लेकिन ध्यान रखें कि सिर्फ अपने ही मन की ना कहें, सामने वाले की बात भी उतनी ही ईमानदारी से सुनें क्योंकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। रिश्ते दोनों तरफ की गलतियों से ही दरकते हैं इसलिए संयम रखें और अपनी गलतियों को भी स्वीकारें।
-ममता भदौरिया

Thursday, 6 December 2012



तुम्हारी याद बनकर हर घड़ी तड़पाता  है 
ये वो वक़्त है जो रुकता ही नहीं 
ठहरता ही नहीं 
हर पल तुम्हारी याद बनकर 
सामने खड़ा हो जाता है 
-ममता भदौरिया 

उस दिन
तुम्हें रोक लेती
तो अच्छा था
ना तुम मिले
ना ये इंतजार
खत्म हुआ
-ममता भदौरिया


Sunday, 21 October 2012



एक रुह जो दिल में उतरती जा रही है
क्यों मुस्कुराकर वो मुझे अपना रही है
-ममता भदौरिया 

Friday, 19 October 2012



-ममता भदौरिया 
जो कभी सुनते नहीं थे
आज वो सुनने लगे
नित नये सपने सलोने
साथ वो बुनने लगे
फिर वही बातें पुरानी
रोज़ के किस्से कहानी
और घंटों बैठना
याद वो करने लगे
रूठना उनका मनाना
आज भी वो याद है
फिर मिलेंगे एक दिन
कोशिशें करने लगे
एक वादे को लिए
इस मोड़ तक तो आ गये
हैं मंजिलें जुदा जुदा
रास्ते कहने लगे.